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सुप्रीम कोर्ट टीपनी करना कोई अपराध नहीं

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सुप्रीम कोर्ट टीपनी करना कोई अपराध नहीं Good Morning Nagpur

कोर्ट या सरकार के फ़ैसले पर टिपनी करना कोई गुनाह नहीं:सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट की इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के पीछे का संदर्भ और मामला काफी गहरा है।

 नागपुर:सुप्रीम कोर्ट का 'आलोचना का अधिकार' फैसला मामला क्या था?
यह टिप्पणी मुख्य रूप से अनुच्छेद 370 (Article 370) को हटाए जाने के फैसले के संदर्भ में और महाराष्ट्र के एक कॉलेज प्रोफेसर (जावेद अहमद हाजम) के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करते समय आई थी।
प्रोफेसर पर आरोप था कि उन्होंने सोशल मीडिया पर अनुच्छेद 370 हटने पर "दुख" व्यक्त किया था और पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस की बधाई दी थी, जिसे 'देशद्रोह' और 'दो समूहों के बीच नफरत फैलाने' (IPC की धारा 153-A) के रूप में देखा गया था।
2. कोर्ट ने क्या कहा? (Key Highlights)
जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने इस मामले में ऐतिहासिक बातें कहीं:
 * असहमति का अधिकार: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर नागरिक को सरकार के किसी भी फैसले (जैसे अनुच्छेद 370 हटाना) से असहमत होने या उसकी आलोचना करने का अधिकार है।
 * लोकतंत्र की नींव: अदालत ने कहा कि अगर सरकार के फैसलों की शांतिपूर्ण आलोचना पर रोक लगाई गई, तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
 * अवमानना बनाम आलोचना: कोर्ट ने यह रेखा खींची कि किसी फैसले के कानूनी पहलुओं या उसके प्रभाव की आलोचना करना 'अदालत की अवमानना' नहीं है।
3. यह जजमेंट क्यों आया?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के जरिए समाज और पुलिस प्रशासन को कुछ कड़े संदेश दिए हैं:
 * पुलिस की अति-सक्रियता पर रोक: अक्सर देखा गया है कि सोशल मीडिया पर की गई आलोचना को तुरंत FIR में बदल दिया जाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'विरोध' को 'विद्रोह' नहीं माना जा सकता।
 * अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा: संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को बोलने की आजादी देता है। कोर्ट ने माना कि एक नागरिक अपनी भावनाओं को (जब तक वह हिंसा न भड़काए) व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है।
 * न्यायपालिका की परिपक्वता: कोर्ट ने यह संदेश दिया कि न्यायपालिका इतनी कमजोर नहीं है कि शैक्षणिक या तार्किक आलोचना से उसकी गरिमा कम हो जाए।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जो अपनी राय रखने से डरते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि "किसी फैसले को गलत बताना या उससे दुखी होना अपराध नहीं है।"

 
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