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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और शादी के झूठे वादे के आधार पर दर्ज होने वाले रेप के मामलों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़ी टिप्पणी की है। एक महिला द्वारा अपने लिव-इन पार्टनर पर लगाए गए बलात्कार के आरोपों की सुनवाई करते हुए अदालत ने रिश्ते की प्रकृति और सहमति पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
मामले की मुख्य बातें:
• कोर्ट का सवाल: सुनवाई के दौरान जस्टिस ने महिला की याचिका पर सवाल उठाते हुए कहा, "जब आप बिना शादी के उस व्यक्ति के साथ लंबे समय तक लिव-इन में रहीं और आपसी सहमति से बच्चा भी पैदा किया, तो अब इसे रेप कैसे कहा जा सकता है?"
• रिश्ते की प्रकृति: अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि लिव-इन रिलेशनशिप के अपने 'जोखिम' होते हैं। अगर दो वयस्क आपसी सहमति से एक साथ रहते हैं और परिवार आगे बढ़ाते हैं, तो बाद में रिश्ता टूटने पर उसे अपराध की श्रेणी में डालना कानून का दुरुपयोग हो सकता है।
• शादी का झूठा वादा: महिला का आरोप था कि उसके पार्टनर ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को संदेह के घेरे में रखा क्योंकि दोनों का साथ रहना और संतान होना एक दीर्घकालिक सहमति को दर्शाता है।
कानूनी निहितार्थ:
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उन मामलों में नजीर बन सकती है जहाँ लिव-इन पार्टनर के बीच अनबन होने पर 'बलात्कार' की धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज कराए जाते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि:
1. सहमति (Consent) और धोखाधड़ी के बीच एक बारीक रेखा होती है।
2. लंबे समय तक साथ रहने और संतान होने के बाद 'शादी के झूठे वादे' की दलील को साबित करना बेहद कठिन होता है।
3. लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले व्यक्तियों को इसके सामाजिक और कानूनी परिणामों के प्रति जागरूक रहना चाहिए।