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छत्रपति संभाजी नगर में एक किसान को अपनी मेहनत का कड़वा घूंट पीना पड़ा। 1262 किलोग्राम प्याज मंडी में बेचने पर उसे केवल ₹1262 मिले, यानी औसतन ₹1 प्रति किलो का भाव।
खर्च का विवरण:
• मंडी तक लाने का परिवहन खर्च: ₹500
• कुली और तुलाई का खर्च: ₹163
• भराई और वाराई: ₹50
• कुल खर्च: ₹1263
अंत में किसान के पास मुनाफे के नाम पर कुछ नहीं बचा, बल्कि वह ₹1 के घाटे में रहा।
विदेशों में प्याज की कीमतें: एक बड़ा अंतर
जबकि भारतीय किसान ₹1 प्रति किलो के भाव पर संघर्ष कर रहा है, अंतर्राष्ट्रीय बाजारों (विशेषकर खाड़ी देशों और यूरोप) में भारतीय प्याज की मांग और कीमतें बहुत अधिक रहती हैं।
• दुबई (UAE) और खाड़ी देश: इन देशों में प्याज की खुदरा कीमत अक्सर 3 से 6 दिरहम प्रति किलो के बीच होती है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग ₹65 से ₹135 प्रति किलो तक बैठती है।
• यूरोप और ब्रिटेन: यहाँ प्याज की कीमतें गुणवत्ता के आधार पर £1.00 से £1.50 (लगभग ₹100 से ₹150) प्रति किलो तक जा सकती हैं।
• फिलीपींस और वियतनाम: आपूर्ति की कमी के दौरान इन देशों में कीमतें ₹200 प्रति किलो के पार भी पहुंच चुकी हैं।
किसान को नुकसान क्यों?
किसान को हो रहे इस भारी नुकसान के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं:
1. बिचौलियों का प्रभाव: किसान से मंडी और मंडी से निर्यातक (Exporter) तक पहुँचने के बीच कई स्तरों पर कमीशन एजेंट और बिचौलिए होते हैं, जिससे किसान को मिलने वाला दाम घट जाता है।
2. निर्यात शुल्क और पाबंदियां: जब सरकार निर्यात पर प्रतिबंध लगाती है या भारी 'एक्सपोर्ट ड्यूटी' लगाती है, तो घरेलू बाजार में प्याज की भरमार हो जाती है और कीमतें गिर जाती हैं।
3. कोल्ड स्टोरेज का अभाव: उचित भंडारण की सुविधा न होने के कारण किसान को डर रहता है कि प्याज खराब हो जाएगा, इसलिए वह इसे किसी भी कीमत पर बेचने को मजबूर हो जाता है।
यह विडंबना ही है कि जो प्याज विदेशों में 'प्रीमियम' भाव पर बिकता है, उसी फसल को उगाने वाला भारतीय किसान आज कर्ज की भेंट चढ़ रहा है।