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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि यदि डीएनए (DNA) टेस्ट से यह साबित हो जाता है कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक (biological) पिता नहीं है, तो वह उसे गुजारा भत्ता (maintenance) देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान व्यवस्था दी है कि आधुनिक विज्ञान के प्रमाण कानूनी अनुमानों से ऊपर हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि एक बार निर्विवाद रूप से डीएनए रिपोर्ट में यह पुष्टि हो जाती है कि व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे बच्चे के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, भले ही वह बच्चा शादी के दौरान ही क्यों न पैदा हुआ हो।
फैसले की मुख्य बातें:
• विज्ञान बनाम कानून: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 116) के तहत शादी के दौरान पैदा हुए बच्चे को जायज मानने का अनुमान लगाया जाता है, लेकिन वैज्ञानिक सत्य के सामने इस कानूनी अनुमान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
• कानूनी बाध्यता का अंत: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब वैज्ञानिक सबूत यह बता दें कि कोई रिश्ता मौजूद ही नहीं है, तो उस व्यक्ति पर बच्चे के खर्च का बोझ डालना "अन्यायपूर्ण" होगा।
• सरकार को निर्देश: अदालत ने बच्चे के भविष्य और कल्याण के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश दिया है कि वे बच्चे की देखभाल के लिए उचित कदम उठाएं।
मामला क्या था?
यह मामला एक महिला द्वारा दायर अपील से जुड़ा था, जिसमें उसने अपने पूर्व पति से बच्चे के लिए गुजारा भत्ता मांगा था। ट्रायल कोर्ट के आदेश पर हुए डीएनए टेस्ट में यह सामने आया कि व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है। इसी आधार पर निचली अदालतों ने बच्चे के भरण-पोषण की मांग खारिज कर दी थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया है।