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मुंबई/नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने लोन रिकवरी को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है। मंगलवार को जारी किए गए नए ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, अब बैंकों और वित्तीय संस्थानों को उन संपत्तियों पर अधिक नियंत्रण मिलेगा जो लोन के बदले गिरवी (Collateral) रखी गई हैं।
खबर के मुख्य बिंदु:
• सीधी जप्ती की अनुमति: यदि कोई लोन खाता NPA (Non-Performing Asset) बन जाता है और रिकवरी के अन्य सभी रास्ते बंद हो जाते हैं, तो बैंक कानूनी प्रक्रिया के तहत उस संपत्ति को अपने कब्जे में ले सकेंगे।
• 7 साल की समय सीमा: बैंक जप्त की गई संपत्ति को अधिकतम 7 साल तक ही अपने पास रख सकते हैं। इस अवधि के भीतर उन्हें संपत्ति बेचकर अपना बकाया वसूलना होगा।
• पारदर्शिता और मूल्यांकन: जप्त की गई संपत्तियों को हर 2 साल में दोबारा वैल्युएट (Revaluation) करना होगा। यदि 7 साल में बैंक संपत्ति नहीं बेच पाता, तो उसे बैंक की अपनी 'फिक्स्ड एसेट' मान लिया जाएगा।
• पुराने मालिक को नहीं बेच सकेंगे: बैंक वह संपत्ति वापस उसी डिफॉल्टर (लोन लेने वाले) या उसके रिश्तेदारों को नहीं बेच पाएंगे। इसका उद्देश्य प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना है।
क्यों लिए गए ये नियम?
RBI का कहना है कि बैंकों के पास ऐसी संपत्तियों का अंबार लगा रहता है जिनकी बिक्री में देरी होती है। इन नए नियमों (जिन्हें SNFA - Specified Non-Financial Assets कहा जा रहा है) से बैंकों को अपना पैसा जल्द वसूलने में मदद मिलेगी और बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता आएगी।