जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं
पुणे:महाराष्ट्र राज्य बोर्ड की परीक्षाओं में जिस तरह से शिक्षकों की मिलीभगत से नकल और धांधली के मामले सामने आए हैं, उसने राज्य की पूरी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। परीक्षा किसी भी छात्र के भविष्य की नींव होती है, लेकिन जब इस नींव को ही भ्रष्टाचार और शॉर्टकट के दीमक चाटने लगें, तो समाज का पतन निश्चित है।
नैतिकता का पतन
सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि इस 'नकल घोटाले' के सूत्रधार वे लोग हैं, जिन्हें समाज 'गुरु' का दर्जा देता है। छात्रों को सही मार्ग दिखाने वाले शिक्षक ही जब चंद रुपयों के लालच में या अपने संस्थान का परिणाम (Result) सुधारने के लिए प्रश्नपत्रों की गोपनीयता भंग करने लगें, तो हम नई पीढ़ी से ईमानदारी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
सिस्टम की खामियां https://youtube.com/@goodmorningnagpurnews?si=mF7EKKPTXSBU15xX
ग़डचिरोली से लेकर छत्रपति संभाजीनगर तक जिस तरह से ChatGPT और मैसेजिंग ऐप्स का सहारा लेकर नकल कराई गई, वह यह दर्शाता है कि बोर्ड की सुरक्षा व्यवस्था अब पुरानी पड़ चुकी है। तकनीक जहाँ शिक्षा का माध्यम होनी चाहिए थी, वहां वह नकल का हथियार बन गई है। फ्लाइंग स्क्वाड की छापेमारी और कुछ शिक्षकों का निलंबन केवल एक 'बैंड-एड' उपचार है; असली बीमारी सिस्टम की गहराई में छिपी है।
गंभीर परिणाम
नकल से पास होने वाला छात्र शायद डिग्री तो हासिल कर ले, लेकिन वह जीवन की असल परीक्षाओं और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएगा। यह उन मेहनती छात्रों के साथ सरासर अन्याय है जो दिन-रात एक कर अपनी तैयारी करते हैं।
आगे की राह
* कठोर दंड: केवल निलंबन काफी नहीं है, ऐसी गतिविधियों में शामिल लोगों पर आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए।
* सेंटर ब्लैकलिस्टिंग: जिन केंद्रों पर सामूहिक नकल पाई गई है, उनकी मान्यता स्थायी रूप से रद्द की जानी चाहिए।
* डिजिटल सुधार: प्रश्नपत्रों के वितरण और परीक्षा केंद्रों की निगरानी के लिए अधिक सुरक्षित और आधुनिक तकनीक का उपयोग अनिवार्य होना चाहिए।
निष्कर्ष: महाराष्ट्र बोर्ड को अब आत्ममंथन करने की जरूरत है। यदि परीक्षाओं की शुचिता कायम नहीं रही, तो भविष्य में हमारी डिग्रियों की कोई कीमत नहीं रह जाएगी। शिक्षा विभाग को अब 'जीरो टॉलरेंस' के नारे को जमीन पर उतार कर दिखाना होगा।
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