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प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक हालिया सुनवाई के दौरान मानवाधिकार आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आयोग अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिमों के साथ होने वाली लिंचिंग (Mob Lynching) की घटनाओं पर अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
कोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि कई गंभीर शिकायतों के बावजूद मानवाधिकार आयोग द्वारा ठोस कदम नहीं उठाए गए। न्यायमूर्ति ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा करना आयोग का प्राथमिक कर्तव्य है, लेकिन लिंचिंग जैसे संवेदनशील मुद्दों पर आयोग का रवैया उदासीन प्रतीत होता है।
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां:
• उदासीनता पर सवाल: कोर्ट ने पूछा कि आखिर क्यों मानवाधिकार आयोग ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने या त्वरित कार्रवाई करने में विफल रहा है?
• संविधान की दुहाई: अदालत ने याद दिलाया कि जीवन का अधिकार और सुरक्षा हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, चाहे वह किसी भी धर्म का हो।
• जवाबदेही तय हो: कोर्ट ने संकेत दिए कि सरकारी संस्थाओं को अपनी जवाबदेही निष्पक्ष रूप से निभानी चाहिए ताकि जनता का कानून पर भरोसा बना रहे।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
इस टिप्पणी को कानूनी हलकों में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि हाई कोर्ट के इस कड़े रुख से आने वाले समय में मानवाधिकार आयोग को अपनी कार्यशैली में बदलाव करने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा के मामलों में अधिक पारदर्शी रिपोर्ट पेश करने का दबाव बढ़ेगा।
संदर्भ: मक्तूब हिंदी (Maktoob Hindi) के सौजन्य से।
दिनांक: 1 मई 2026