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वॉशिंगटन: क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी बच्चे को पार्सल की तरह पैक करके डाक से भेजा जा सकता है? आज के समय में यह बात कानूनी जुर्म और बेहद खतरनाक लग सकती है, लेकिन करीब 100 साल पहले अमेरिका में यह हकीकत थी। 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी डाक सेवा (USPS) के जरिए लोग अपने बच्चों को एक शहर से दूसरे शहर अपने रिश्तेदारों के पास भेज दिया करते थे।
कैसे शुरू हुआ बच्चों को 'पोस्ट' करने का सिलसिला?
साल 1913 में अमेरिका में 'पार्सल पोस्ट' सेवा की शुरुआत हुई थी। उस समय नियम स्पष्ट नहीं थे कि डाक से क्या भेजा जा सकता है और क्या नहीं। चूंकि ट्रेन के टिकट के मुकाबले डाक का टिकट काफी सस्ता पड़ता था, इसलिए गरीब परिवारों ने इसका एक अनोखा रास्ता निकाला।
• पहला मामला: ओहायो के 'बीगल' (Beagle) दंपति ने सबसे पहले इस सेवा का लाभ उठाया। उन्होंने अपने 8 महीने के बेटे को डाक के जरिए उसकी दादी के घर भेजा था। इसके लिए उन्होंने महज 15 सेंट के टिकट खरीदे थे और बच्चे का बीमा भी करवाया था।
• सुरक्षित सफर: बच्चों को सामान की तरह बोरी में बंद नहीं किया जाता था, बल्कि वे डाकिए की निगरानी में सुरक्षित सफर करते थे। कई बार डाकिया बच्चों को अपनी गोद में या बैग में बिठाकर ले जाता था।
चिट्ठी की तरह लगता था स्टैम्प
तस्वीरों में देखा जा सकता है कि कैसे बच्चों के कपड़ों पर डाक टिकट (Stamps) लगा दिए जाते थे। डाकिया उन्हें 'लाइव पार्सल' की तरह ट्रीट करता था और उनके गंतव्य तक पहुँचाने की जिम्मेदारी उसकी होती थी। रिकॉर्ड के अनुसार, सबसे लंबी यात्रा एक छोटी बच्ची 'मार्क पीयरस्टोर्फ' ने की थी, जिसे लगभग 73 मील दूर उसके दादा-दादी के घर भेजा गया था।
क्यों बंद हुई यह सेवा?
जैसे-जैसे यह चलन बढ़ा, डाक विभाग को अपनी सुरक्षा और जिम्मेदारी का एहसास हुआ। बच्चों को इस तरह भेजना न केवल जोखिम भरा था, बल्कि यह विभाग के नियमों के खिलाफ भी था।
अंततः, 1915 में डाक विभाग ने आधिकारिक तौर पर 'इंसानों को पार्सल' के रूप में भेजने पर पाबंदी लगा दी। हालांकि, इसके कुछ छिटपुट मामले 1920 तक सामने आते रहे, जिसके बाद कड़े नियमों ने इस विचित्र प्रथा पर पूरी तरह से विराम लगा दिया।
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