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नागपुर: नागपुर नगर निगम में पांच को-ऑप्टेड सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होते ही भ्रष्टाचार और सौदेबाजी के आरोपों ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। ताज़ा विवाद AIMIM के हिस्से की मानी जा रही सीट को लेकर सामने आ रहा है, जहाँ पार्टी के भीतर और बाहर 'सीट की खरीद-फरोख्त' की चर्चाएँ तेज हैं।
विवाद की मुख्य वजह
को-ऑप्टेड सीटों पर आमतौर पर पार्टी के अनुभवी कार्यकर्ताओं या विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाता है। लेकिन नागपुर में आरोप लग रहे हैं कि AIMIM के स्थानीय समीकरणों का फायदा उठाकर कुछ बड़े नामों और रसूखदारों ने इस सीट पर कब्जा करने के लिए भारी 'फंड' या आर्थिक लेनदेन का सहारा लिया है।
आरोपों के घेरे में कौन?
1. पार्टी के भीतर मतभेद: स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जमीन पर काम करने वाले निष्ठावान नेताओं को नजरअंदाज कर किसी 'बाहरी' या 'पैसे वाले' व्यक्ति को सीट देने की तैयारी चल रही है।
2. नेताओं की भूमिका: सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी के कुछ स्थानीय पदाधिकारियों ने निजी फायदे के लिए सीट का सौदा किया है?
3. विपक्षी निशाना: अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे को लपकते हुए कह रहे हैं कि "जो पार्टी सिद्धांतों की बात करती थी, वह अब सीटों की नीलामी कर रही है।"
कार्यकर्ताओं में नाराजगी
नगर निगम चुनाव की तैयारी कर रहे कई दावेदारों का मानना है कि अगर को-ऑप्ट सीटों पर इस तरह की सौदेबाजी होती है, तो इससे पार्टी की छवि को भारी नुकसान पहुँचेगा। कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि किसी गैर-हकदार व्यक्ति को मौका दिया गया, तो वे सामूहिक इस्तीफा भी दे सकते हैं।
क्या कहती है गाइडलाइन?
नियमों के मुताबिक, को-ऑप्टेड सदस्य वही बन सकता है जिसके पास निगम प्रशासन का अनुभव हो या वह किसी विशेष क्षेत्र (जैसे वकालत, चिकित्सा या इंजीनियरिंग) का विशेषज्ञ हो। आरोपों के अनुसार, सौदेबाजी के चक्कर में इन नियमों को भी ताक पर रखा जा रहा है।