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सरकार  अपने ही पांसे में फाँसी ।विशेष सत्र और महिला आरक्षण बिल: राजनीति, मंशा और चुनावी समीकरण

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सरकार  अपने ही पांसे में फाँसी ।विशेष सत्र और महिला आरक्षण बिल: राजनीति, मंशा और चुनावी समीकरण Good Morning Nagpur

सरकार  अपने ही पांसे में फाँसी ।विशेष सत्र और महिला आरक्षण बिल: राजनीति, मंशा और चुनावी समीकरण

नई दिल्ली: केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा सितंबर 2023 में बुलाए गए संसद के 'विशेष सत्र' ने देश के राजनीतिक पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया था। जहाँ एक ओर सरकार इसे ऐतिहासिक कदम बता रही थी, वहीं विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे आगामी विधानसभा चुनावों से प्रेरित एक 'चुनावी स्टंट' करार दिया।

समय पर सवाल: २०२६में ही क्यों?

आलोचकों का तर्क है कि भाजपा पिछले 9 सालों से सत्ता में थी, तो इस बिल को लाने के लिए 2023 के अंत का ही चुनाव क्यों किया गया?

• चुनावी राज्य: उस समय राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे 4-5 प्रमुख राज्यों में चुनाव होने वाले थे।

• राजनीतिक लाभ: आरोप लगा कि भाजपा ने महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए इस इमोशनल कार्ड का इस्तेमाल किया ताकि राज्यों में सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) को कम किया जा सके।

2. 'मन में खोट': लागू होने में देरी का पेच

विपक्ष का सबसे बड़ा हमला बिल के भीतर छिपी शर्तों पर था। सरकार ने बिल तो पास कर दिया, लेकिन इसे तुरंत लागू करने के बजाय दो बड़ी शर्तें जोड़ दीं:

1. जनगणना (Census)

2. परिसीमन (Delimitation)

इसका अर्थ यह है कि महिलाओं को आरक्षण 2024 के लोकसभा चुनाव में नहीं मिला, बल्कि इसके 2029 या उससे भी बाद लागू होने की संभावना है। इसी कारण विपक्ष ने कहा कि भाजपा की 'नियत' साफ़ नहीं है—वे सिर्फ क्रेडिट लेना चाहते हैं, हक देना नहीं।

3. भाजपा बनाम अन्य दल: श्रेय की राजनीति

यह कहना कि 'खोट' केवल एक तरफ है, शायद पूरी तस्वीर न दिखाए। भारतीय राजनीति में इस बिल का इतिहास काफी उलझा हुआ है:

• विपक्ष का स्टैंड: कांग्रेस और अन्य दलों का कहना है कि यह बिल सबसे पहले वे लाए थे, लेकिन तब भाजपा और अन्य क्षेत्रीय दलों ने इसका विरोध किया था।

• ओबीसी (OBC) कोटा का मुद्दा: वर्तमान में विपक्ष (विशेषकर राहुल गांधी और क्षेत्रीय दल) मांग कर रहे हैं कि महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से कोटा होना चाहिए। बिना इसके, यह बिल समाज के बड़े वर्ग के साथ अन्याय है।

4. विशेष सत्र की आलोचना

संसद का विशेष सत्र बिना किसी घोषित एजेंडे के बुलाया गया था। अचानक महिला आरक्षण बिल पेश करने को विपक्ष ने "संसदीय परंपराओं का अपमान" और "हेडलाइन मैनेजमेंट" बताया। आलोचकों के अनुसार, सरकार ज्वलंत मुद्दों (जैसे महंगाई और बेरोजगारी) से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे 'मास्टरस्ट्रोक' इवेंट्स का सहारा लेती है।

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